ज्यादा नहीं, वर्ष 2016 के शुरुआती महीने जनवरी की ही बात थी। मालदा जिले के कालियाचक में तीन जनवरी 2016 को हुई हिंसा ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। सवालों के घेरे में उस वक्त भी पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का मुस्लिम-प्रेम था। चलिए वो चुनावी दौर था। दीदी की नज़र वोट बैंक से खेलने की थी, चाहे कीमत कुछ भी चुकानी पड़े। लेकिन आज जब बीते 13 दिसंबर 2016 को पश्चिम बंगाल का धुलागढ़ सांप्रदायिक हिंसा में सन गया तो राज्य की मुखिया को कड़ा एक्शन लेना था, ऐसा न कर मुख्यमंत्री ने इसकी आवाज़ ही दबा दी। जी हां, भारतीय जनता पार्टी पर मीडिया को मैनेज करने का आरोप लगाने वाले क्या आज इस पर बोलेंगे कि क्या तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल को मीडिया को इस ख़बर न दिखाने के लिए मैनेज कर लिया ? या पश्चिम बंगाल में दीदी के शागिर्दों के हनक के सामने मीडिया की आवाज़ दबा दी गई ? चलिए हमारा मक़सद औरों की तरह आरोप लगाना नहीं होगा बल्कि इस विषय के हर एक बिंदु की ओर चर्चा करने की होगी, क्योंकि जिस वक्त ये घटना घटित हुई, मैं स्वयं पश्चिम बंगाल में थी और अपने कार्यकर्ताओं के लगातार संपर्क में थी, कि कैसे भी इस घटना पर काबू पाएं। मैं विचलित इसलिए थी क्योंकि इस घटना में मंदिर पर हमला हुआ, दर्जनों घरों को लूटा गया, लोगों पर जानलेवा हमले हुए और ताज्जुब कि मीडिया में इसकी बहुत खबर भी नहीं।
पहला मुद्दा है कि यह घटना क्यों हुई ? सर्वविदित है कि यह सांप्रदायिक हिंसा हावड़ा जिले के धुलागढ़ में मीलाद उन-नबी के दिन हुआ। सवाल है कि ऐसे दिन ऐसी हिंसा का घटित होना इस बात का संकेत है कि उस क्षेत्र में ऐसी घटना को अंजाम देने वालों को पता ही नहीं था कि मीलाद उन-नबी का असल में अर्थ क्या है और यह दिन कितना पाक होता है। बता दें कि इस शब्द का मूल मौलिद है जिसका अर्थ अरबी में “जन्म” है। अरबी भाषा में ‘मौलिद-उन-नबी’ का मतलब है- हज़रत मुहम्मद का जन्म दिन है। 1588 में उस्मानिया साम्राज्य में यह त्यौहार का प्रचलन जन मानस में सर्वाधिल प्रचलित हुआ। मवलिद का मूल अरबी भाषा का पद “वलद” है, जिस का अर्थ “जन्म देना”, “गर्भ धारण” या “वारिस” (वंश) के हैं। समकालीन उपयोग में, मवलीद या मौलीद या मौलूद, प्रेषित मुहम्मद के जन्मतिथी या जन्म दिन को कहा जाता है। मौलिद का अर्थ हज़रत मुहम्मद के जन्म दिन का भी है, और इस शुभ अवसर पर संकीर्तन पठन या गायन को भी “मौलिद” कहा जाता है, जिसमें सीरत और नात पढ़ी जाती हैं। ऐसे शुभ मौके पर अगर कोई मंदिर में आग लगा दे, दूसरे धर्म को मानने वालों से वैमनस्यता की भावना के साथ दर्जनों घर फूंक दें, दर्जनों लोगों को घायल कर दे… शर्मिंदगी से भरी हुई है। इससे ये स्पष्ट है कि देश में इस्लाम की शिक्षा दे रहे मदरसों के पाठ्यक्रम को भी पुनर्अवलोकन करने की ज़रूरत है। यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि अक्सर मुस्लिम संप्रदाय को उनके धर्म के नाम पर बहकाकर उनसे उल्टे-पुल्टे काम करवाने की बात सामने आती रही है। ऐसे में देश में मुस्लिम संप्रदाय में जागरुकता को लेकर भी अभियान चलाने की ज़रूरत है, मैं सरकार के सामने इस लेख के माध्यम से यह प्रस्ताव रखना चाह रही हूं।
कहते हैं गलती पर अगर एक अभिभावक पर्दा डाले तो जो गलती करता है, उसकी गलती कम और जो उसे (अभिभावक) शह देता है, उसकी गलती ज्यादा हो जाती है। यहां अभिभावक से तात्पर्य राज्य की मुखिया (मुख्यमंत्री) यानि दीदी से है। आपको याद दिला दें कि बीते जनवरी 2016 में मालदा में जो हिंसात्मक घटना घटी थी, उसमें दीदी का मुस्लिम प्रेम इसलिए सर्वज्ञ था क्योंकि पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का कालियाचक इलाका अफीम की खेती के लिए जाना जाता है (यही कारण है कि इसे भारत का अफगानिस्तान भी कहा जाता है)। मालदा की पूरी आबादी में 51 फीसदी मुस्लिम जनसंख्या है (लेकिन बांग्लादेश से लगातार अवैध घुसपैठ के कारण वास्तविक संख्या के बारे में अनुमान लगाना काफी मुश्किल है)। लेकिन वह ये भी कैसे भूल जाती हैं कि बंगाल में करीब 70 फीसदी हिंदू (2011 की जनगणना के अनुसार) हैं। आप उनकी वजह से भी मुख्यमंत्री हैं। दीदी का मुस्लिम प्रेम ही था कि उन्होंने 30000 मदरसों को 2500 रुपये और 1500 मस्जिदों को 1500 रुपए प्रतिमाह देने का फैसला कर लिया था, जिसकी भविष्य में गंभीरता को देखते हुए माननीय कोलकाता हाईकोर्ट ने उस फैसले को ही खारिज कर दिया था। मां, माटी और मानुष की राजनीति के नारे की उस वक्त भी पोल खुली, जब मालदा हमले के ठीक पहले एक मदरसे के प्रधानाध्यापक काजी मसूम अख्तर पर इसलिए हमला कर दिया गया क्योंकि काजी छात्रों से राष्ट्रीय गान सुनना चाहते थे। यही नहीं सरकार ने कुछ मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा आपत्ति जताने के बाद बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन द्वारा लिखी गई पटकथा वाले नाटक सीरीज के प्रसारण पर भी रोक लगा दी और सलमान रुश्दी को कोलकाता आने पर प्रतिबंध लगा दिया। तुष्टीकरण की हदें पार कर देने वाली सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिन जिलों में मुस्लिमों की आबादी 10 फीसदी से अधिक है, उन जिलों में उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बनाने का फैसला किया गया। और ऐसे में धुलागढ़ जैसी घटनाएं सामने आएं और इस पर राज्य की सरकार चुप्पी साधे है तो इसे आप क्या कहेंगे ?
ऐसे सवाल इसलिए हैरान करते हैं क्योंकि तृणमूल कांग्रेस की मुखिया के तेवर हमेशा से देखने लायक रहे हैं। वो चाहे हाल में पश्चिम बंगाल में सेना के अभ्यास का ही विषय क्यों न रहा हो, आपने देखा होगा कि उन्होंने राज्य सचिवालय में ही रात गुज़ार दी, कहा- जब तक ये सेना नहीं हटेगी, उनका लगातार विरोध जारी रहेगा। लगातार तीन दिनों तक वह मीडिया में प्राइम टाइम और कवर पेज पर छाईं रहीं। सवाल है कि वही मुख्यमंत्री अपने ही राज्य के ऐसे गंभीर विषय पर मौन धारण क्यों किए है ? मीडिया को इसे दिखाने से तो रोक ही दिया और अब पश्चिम बंगाल की पुलिस भाजपा के केंद्रीय प्रतिनिधिमंडल को धुलागढ़ के हिंसा प्रभावित क्षेत्र में जाने से भी रोक देती है। पार्टी के प्रतिनिधिमंडल सांसद जगदंबिका पाल, सतपाल सिंह, प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष और राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा और पार्टी समर्थकों को घटनास्थल से करीब एक किलोमीटर पहले ही रोक दिया जाता है। क्यों ?
तृणमूल कांग्रेस यह बात भी भूल रही है कि असम में जब कांग्रेस ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति पर लंबे समय से खेल रही थी और इसे वहां के मुसलमानों के समझ लिया तो 2016 के असम विधानसभा चुनाव में वहां की सत्ता को ही पलट (लोकतांत्रिक परिवर्तन) डाला। वहां के मुसलमानों ने ही इसलिए क्योंकि देश की कुल आबादी में मुस्लिम आबादी में सर्वाधिक तेजी से वृद्धि असम में दर्ज की गई। राज्य की आबादी में 2001 मुस्लिम 30.9 प्रतिशत थे और इसमें एक दशक बाद 34.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई। सब कुछ उन्हीं के वोटों पर निर्भर था और उनको लगा कि कांग्रेस उन्हें वोटबैंक के लिए बस इस्तेमाल कर रही है। तो क्या ये मान लिया जाए कि पश्चिम बंगाल में यही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब वहां के मुसलमान ही तृणमूल को सब सिखा देंगे। यह इसलिए क्योंकि असम के बाद पश्चिम बंगाल ही वो वह राज्य है जहां बांग्लादेश से अवैध आव्रजन एक मुद्दा अधिक है और इस राज्य में भी मुस्लिम आबादी 2001 के 25.2 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 27 प्रतिशत हो गई है, जिस आंकड़े से तृणमूल कांग्रेस खेल रही है।
ये सोचना राज्य के सभी संप्रदाय के लोगों से भी है कि अगर कोई धर्म के नाम पर आपको लड़वाकर और ‘फूट डालो और शासन करो’ की तर्ज पर शतरंज की चाल चल रहा है तो सावधान हो जाइए। पश्चिम बंगाल तो भाइचारे का अपने में मिसाल रहा है। वहां अगर ऐसी घटनाओं को अंजाम देंगे तो पूरे विश्व में आपकी निंदा होगी। आपका भाइचारा केवल दिखावे भर का रह जाएगा। सोच लीजिए, आपको जाना किस ओर है। और एक बात कि कभी मजहब-प्रेम, देश-प्रेम पर हावी नहीं होना चाहिए। ये देश हमारा है। यहां के हर नागरिक हमारे अपने हैं, ये सोच जिस दिन मन में बिठा लेंगे, हमारे बीच कोई भी फूट नहीं डाल सकता। याद रखिए, वर्ष 1946 में पाकिस्तान के निर्माण के लिये मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ मनाया, जिसके बाद बंगाल में भीषण दंगे हुए थे। कोलकाता के नोआखली नरसंहार में पिछड़ी जाति समेत कई हिन्दुओ की हत्याएं हुई, सैकड़ों ने इस्लाम कबूल लिया। हिंदू महिलाओं का बलात्कार, अपहरण किया गया। वह दृश्य फिर से देश के किसी कोने में देखने को न मिले, हमें ऐसा हिन्दुस्तान बनाना है। हमें देश में ही नहीं, अपने आप में भी परिवर्तन लाना है।
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